Shiva Jyotirling Supreme god

Shiva Jayotir Shiva Linga is one of the first erect phallus of universe, no beginning No end.

ShivaLinga blessing life energy to all human being inside through Kundalini soul chakra.

The true Story of the Jyotir Linga, the Shiv Linga of Light, is one of the most enduring myths of the Puranas and is told many times in various settings.

It recounts the appearance of the first Shiva linga which pierced the three worlds as a brilliant shaft of light and was witnessed by Brahma and Vishnu.

One day Brahma and Vishnu were quarrelling.

Brahma claimed,

‘I created the world. I must be God.” Vishnu retorted, “That you seek validation means you cannot be God,

“ Then who is God?’ Brahma demanded to know.

As he spoke, a huge column of fire split the earth between them and blazed up through the sky to pierce the highest heavens. Astounded, Brahma and Vishnu decide to determine the source and extent of this brilliant pillar of light.

Vishnu became a boar and burrowed deep into the netherworlds. Brahma mounted his goose and flew as far up as the heavens reach.But even after thousands of years they could not find the bottom or the top of the shaft of light.

When they finally give up and returned to their starting place, Shiva emerged from the light in his partial bodily form.

The linga of light is thus the image of the supremacy of Shiva.

It is what Shiva calls the axis mundi or the pillar at the centre of the world, originating deep in the netherworlds, cracking the surface of the earth and splitting the roof of the sky.

In this linga or form, Shiva is not one god among others, but the unfathomable One.

This light is the mysterium tremendum which finally cannot be described or comprehended by any or all faces and attributes.

The legend says, the linga of light was the first linga. After that, Shiva vowed that this unfathomable linga would become small so that people might have it as an emblem for their worship.

Wherever, the linga is, there is a tirtha, which in Sanskrit means a shallow ford. Because the linga by nature is a “crossing place” where the worlds are knit together by the shaft of Shiva. ( A tirtha- kshetra means a place of pilgrimage, Other deities have idols, images, but only Shiva has the world-spanning form of a linga even all planets including Sun ☀getting energy from Jayotir (burning 🔥 fire) ShivLing .

Worship of a shivalingam is considered the prime worship for the devotees of Lord Shiva. Worship of all other forms is considered secondary.

While there are countless Shiva temples throughout world.

Shiva is believed to activate life energy inside soul chakra to all human being through super sexual energy of Shiva, true aspect of his divine nature.

Hindu texts delineate three distinct categories of Shiva shrines: the Jyotir Lingas, the Bhuta Lingas, and the Swaymambhu in Amarnath Lingas.

The twelve Jyotir Lingas located throughout the country are considered the most important and are mentioned in the Vedas.

Worship and tantra mantra meditation remove all type disease negativity from life.

True powerful connect with Supreme god Shiva.

OHM NAMHA SHIVAY

नटराज शिवा

NatRaj Shiva

ब्रह्मांड का प्रतीक : संपूर्ण ब्रह्मांड उसी तरह है जिस तरह कि शिवलिंग का रूप है जिसमें जलाधारी और ऊपर से गिरता पानी है। शिवलिंग का आकार-प्रकार ब्रह्मांड में घूम रही हमारी आकाशगंगा और उन पिंडों की तरह है, जहां जीवन होने की संभावना है। वातावरण सहित घूमती धरती या सारे अनंत ब्रह्माण्ड (ब्रह्माण्ड गतिमान है) का अक्स/धुरी ही शिवलिंग है।

वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे सृष्टि प्रकट होती है उसे शिवलिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही शिवलिंग की प्रतीक है। वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है। बिंदु शक्ति है और नाद शिव। यही सबका आधार है। बिंदु एवं नाद अर्थात ऊर्जा और ध्वनि। यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है।

शिव का आदि और अनादी रूप : ईश्वर निराकार है। शिवलिंग उसी का प्रतीक है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि भगवान शंकर या महादेव भी शिवलिंग का ही ध्यान करते हैं। शून्य, आकाश, अनंत, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे ‘शिवलिंग’ कहा गया है। स्कंद पुराण में कहा गया है कि आकाश स्वयंलिंग है। धरती उसकी पीठ या आधार है और सब अनंत शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे शिवलिंग कहा गया है। शिव पुराण में शिव को संसार की उत्पत्ति का कारण और परब्रह्म कहा गया है। इस पुराण के अनुसार भगवान शिव ही पूर्ण पुरुष और निराकार ब्रह्म हैं।

ब्रह्मांड का प्रतीक : संपूर्ण ब्रह्मांड उसी तरह है जिस तरह कि शिवलिंग का रूप है जिसमें जलाधारी और ऊपर से गिरता पानी है। शिवलिंग का आकार-प्रकार ब्रह्मांड में घूम रही हमारी आकाशगंगा और उन पिंडों की तरह है, जहां जीवन होने की संभावना है। वातावरण सहित घूमती धरती या सारे अनंत ब्रह्माण्ड (ब्रह्माण्ड गतिमान है) का अक्स/धुरी ही शिवलिंग है।

वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे सृष्टि प्रकट होती है उसे शिवलिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही शिवलिंग की प्रतीक है। वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है। बिंदु शक्ति है और नाद शिव। यही सबका आधार है। बिंदु एवं नाद अर्थात ऊर्जा और ध्वनि। यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है।

शिव का आदि और अनादी रूप : ईश्वर निराकार है। शिवलिंग उसी का प्रतीक है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि भगवान शंकर या महादेव भी शिवलिंग का ही ध्यान करते हैं। शून्य, आकाश, अनंत, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे ‘शिवलिंग’ कहा गया है। स्कंद पुराण में कहा गया है कि आकाश स्वयंलिंग है। धरती उसकी पीठ या आधार है और सब अनंत शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे शिवलिंग कहा गया है। शिव पुराण में शिव को संसार की उत्पत्ति का कारण और परब्रह्म कहा गया है। इस पुराण के अनुसार भगवान शिव ही पूर्ण पुरुष और निराकार ब्रह्म हैं।

निराकार ज्योति का प्रतीक : पुराणों में शिवलिंग को कई अन्य नामों से भी संबोधित किया गया है, जैसे प्रकाश स्तंभलिंग, अग्नि स्तंभलिंग, ऊर्जा स्तंभलिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभलिंग आदि। ज्योतिर्लिंग उत्पत्ति के संबंध में पुराणों में अनेक मान्यताएं प्रचलित हैं। वेदानुसार ज्योतिर्लिंग यानी ‘व्यापक ब्रह्मात्मलिंग’ जिसका अर्थ है ‘व्यापक प्रकाश’। जो शिवलिंग के 12 खंड हैं। शिव पुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है।

कब से प्रारंभ हुई शिवलिंग की पूजा : भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर हुए विवाद को सुलझाने के लिए एक दिव्य लिंग (ज्योति) को प्रकट किया था। इस ज्योतिर्लिंग का आदि और अंत ढूंढते हुए ब्रह्मा और विष्णु को शिव के परब्रह्म स्वरूप का ज्ञान हुआ। इसी समय से शिव को परब्रह्म मानते हुए उनके प्रतीक रूप में ज्योतिर्लिंग की पूजा आरंभ हुई। हिन्दू धर्म में मूर्ति की पूजा नहीं होती, लेकिन शिवलिंग और शालिग्राम को भगवान शंकर और विष्णु का विग्रह रूप मानकर इसी की पूजा की जानी चाहिए।

पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाकर स्वामी कार्त्तिकेय जब तक लौटे तब तक गणेशजी का ‘सिद्धि’ और ‘बुद्धि’ नाम वाली दो कन्याओं के साथ विवाह हो चुका था और उन्हें ‘क्षेम’ तथा ‘लाभ’ नामक दो पुत्र भी प्राप्त हो चुके थे। यह सब देखकर स्वामी कार्त्तिकेय अत्यंत रुष्ट होकर क्रौञ्च पर्वत पर चले गए। माता पार्वती वहां उन्हें मनाने पहुंचीं। पीछे शंकर भगवान्‌ वहां पहुंचकर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए और तब से मल्लिकार्जुन-ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रख्यात हुए। इनकी अर्चना सर्वप्रथम मल्लिका-पुष्पों से की गई थी। मल्लिकार्जुन नाम पड़ने का यही कारण है।